उत्तर प्रदेश में शिक्षामित्रों की संख्या में पिछले एक दशक में भारी गिरावट दर्ज की गई है। 2013-14 में प्रदेश में कुल 1,78,000 शिक्षामित्र कार्यरत थे, लेकिन वर्तमान में यह संख्या घटकर 1,42,929 रह गई है। यानी 35,071 शिक्षामित्र अब इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं। सवाल उठता है कि ये शिक्षामित्र कहां गए और किन कारणों से उनकी संख्या में इतनी गिरावट आई?
शिक्षामित्रों की संख्या में गिरावट के प्रमुख कारण
1. समायोजन रद्द होने का असर
यूपी सरकार ने शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक पद पर समायोजित किया था, लेकिन 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस समायोजन को अवैध ठहरा दिया। इससे हजारों शिक्षामित्र दोबारा अपने पुराने पद पर लौटने को मजबूर हुए। लेकिन इस फैसले के चलते बहुत से शिक्षामित्र हताश हो गए और उन्होंने या तो नौकरी छोड़ दी या फिर अन्य विकल्प तलाशने लगे।
2. वेतन में भारी कटौती और आर्थिक संकट
समायोजन रद्द होने से पहले शिक्षामित्र सहायक अध्यापक के रूप में ₹40,000 तक वेतन पाते थे, लेकिन समायोजन रद्द होते ही उन्हें फिर से मात्र ₹10,000 मासिक वेतन पर वापस आना पड़ा। इतनी कम आय में परिवार का भरण-पोषण कठिन हो गया, जिससे कई शिक्षामित्रों ने नौकरी छोड़ दी या अन्य काम की तलाश में चले गए।
3. सेवा अवधि और रिटायरमेंट
बहुत से शिक्षामित्र 50 वर्ष की आयु के आसपास पहुंच चुके थे। सरकारी नियमों के अनुसार, वे अब किसी भी नई सरकारी नौकरी के लिए पात्र नहीं थे, जिससे वे मजबूरी में नौकरी छोड़ने लगे। कुछ शिक्षामित्रों की सेवा अवधि पूरी होने के कारण भी उनकी संख्या में गिरावट आई।
4. अन्य सरकारी और निजी नौकरियों की तलाश
कई शिक्षामित्रों ने सरकारी भर्तियों की परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी, जिसमें से कुछ को सफलता भी मिली। वहीं, कुछ शिक्षामित्रों ने प्राइवेट स्कूलों, कोचिंग संस्थानों या अन्य क्षेत्रों में जाकर नौकरी करना बेहतर समझा, जिससे वे शिक्षामित्र पद छोड़ गए।
5. स्वास्थ्य समस्याएं और असमय मृत्यु
न्यायिक लड़ाई, वेतन कटौती और नौकरी की अनिश्चितता के कारण हजारों शिक्षामित्र तनाव में रहने लगे। इसका असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा। रिपोर्ट्स के अनुसार, कई शिक्षामित्र अवसाद में चले गए, कुछ को गंभीर बीमारियां हो गईं, तो कुछ की असमय मृत्यु हो गई।
6. आंदोलन और हताशा
वेतन वृद्धि और नियमितीकरण की मांग को लेकर शिक्षामित्र लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। बार-बार आश्वासन मिलने के बावजूद कोई स्थायी समाधान नहीं निकला, जिससे निराश होकर कई शिक्षामित्रों ने शिक्षा विभाग से अलग होने का फैसला कर लिया।
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शिक्षामित्रों के भविष्य को लेकर सवाल
प्रदेश में शिक्षामित्रों की स्थिति अभी भी अनिश्चित बनी हुई है। वे लगातार सरकार से स्थायी शिक्षक बनाने और वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।
सरकार ने कुछ समय पहले शिक्षामित्रों के लिए "विशेष शिक्षक भर्ती योजना" का प्रस्ताव रखा था, जिसमें उन्हें कुछ शर्तों के साथ शिक्षक बनने का मौका दिया जाना था, लेकिन यह योजना भी विवादों में घिर गई।
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अगर सरकार जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाती, तो हो सकता है कि आने वाले वर्षों में शिक्षामित्रों की संख्या और भी घट जाए। शिक्षामित्रों का भविष्य क्या होगा? क्या सरकार कोई नई नीति लाएगी? ये सवाल अब भी अनसुलझे हैं।
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